Wednesday, September 23, 2026

राष्ट्रीय

दिल्ली SIR के दौरान ‘Logical Discrepancy’ से जुड़ा नोटिस आया? जानें 11 कारण और आगे की प्रक्रिया

दिल्ली SIR के दौरान ‘Logical Discrepancy’ से जुड़ा नोटिस आया? जानें 11 कारण और आगे की प्रक्रिया

नई दिल्ली: दिल्ली में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए हैं। इन नोटिसों में दो प्रमुख वजहें सामने आई हैं—‘No Mapping’ और ‘Logical Discrepancy’। चुनावी रिकॉर्ड की जांच के दौरान करीब 19.33 लाख मतदाताओं के डेटा में अलग-अलग तरह की logical discrepancies चिन्हित की गई हैं, जबकि करीब 13.79 लाख मतदाताओं का रिकॉर्ड पिछली SIR सूची से मैप नहीं हो पाया।

22 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में भी ‘Logical Discrepancy’ को लेकर सवाल उठा। अदालत ने चुनाव आयोग से इस शब्द के आधार और नोटिस जारी करने की प्रक्रिया को स्पष्ट करने को कहा। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि मतदाताओं को यह साफ तौर पर बताया जाना चाहिए कि उनके रिकॉर्ड में आखिर किस तरह की गड़बड़ी मिली है और उसे दूर करने के लिए कौन से दस्तावेज जरूरी होंगे।

आखिर क्या होती है ‘Logical Discrepancy’?

सरल भाषा में समझें तो Logical Discrepancy का मतलब मतदाता के मौजूदा रिकॉर्ड में ऐसी असंगति से है, जिसे चुनाव आयोग के डेटा सिस्टम ने जांच के लिए चिन्हित किया है।

यह जरूरी नहीं है कि ऐसी discrepancy का मतलब मतदाता का रिकॉर्ड गलत या फर्जी है। यह पुराने और नए चुनावी रिकॉर्ड में नाम, उम्र, रिश्ते या दूसरे विवरणों के बीच अंतर की वजह से भी सामने आ सकती है। सॉफ्टवेयर द्वारा किसी रिकॉर्ड को flag किए जाने के बाद उसकी मानवीय स्तर पर जांच और मतदाता का जवाब महत्वपूर्ण हो जाता है।

दिल्ली SIR में Logical Discrepancy की 11 तरह की वजहें

दिल्ली में चुनावी डेटा की जांच के दौरान 11 तरह की logical discrepancies को चिन्हित किया गया है। इनमें परिवार के सदस्यों की उम्र, रिश्तों और नाम से जुड़े अंतर के अलावा पुराने और नए रिकॉर्ड के बीच असंगतियां शामिल हैं।

1. दो बच्चों के बीच 9 महीने से कम उम्र का अंतर

अगर एक ही माता-पिता से जुड़े दो बच्चों की दर्ज उम्र में 9 महीने से कम का अंतर दिखाई देता है, तो सिस्टम इसे जांच के लिए flag कर सकता है।

2. माता-पिता और बच्चे के बीच 15 साल से कम उम्र का अंतर

अगर रिकॉर्ड के मुताबिक माता-पिता और बच्चे के बीच उम्र का अंतर 15 साल से कम है, तो इसे भी logical discrepancy की श्रेणी में रखा गया है।

3. माता-पिता और बच्चे के बीच 50 साल से ज्यादा का अंतर

इसके उलट यदि रिकॉर्ड में माता-पिता और बच्चे की उम्र के बीच 50 साल से अधिक का अंतर दिखाई देता है, तो वह भी सिस्टम में जांच के लिए चिन्हित हो सकता है।

4. दादा-दादी और पोते-पोती के बीच 40 साल से कम उम्र का अंतर

यदि मतदाता और उसके दर्ज दादा-दादी के बीच उम्र का अंतर 40 साल से कम है, तो रिकॉर्ड को discrepancy के तौर पर flag किया जा सकता है।

5. माता-पिता के नाम में अंतर

मौजूदा मतदाता सूची और पिछली SIR सूची में माता-पिता के नाम अलग-अलग दर्ज होने पर भी रिकॉर्ड जांच के दायरे में आ सकता है।

6. रिश्ते की जानकारी में बदलाव

पुराने और नए रिकॉर्ड में रिश्ते की श्रेणी बदल जाने पर भी discrepancy सामने आ सकती है। उदाहरण के लिए, एक रिकॉर्ड में पिता और दूसरे में माता को संबंधित व्यक्ति के रूप में दर्ज किया गया हो।

7. पिता और पति के नाम से जुड़ा अंतर

कुछ रिकॉर्ड में मौजूदा सूची में किसी व्यक्ति को पिता से जोड़ा गया है, जबकि पिछली SIR सूची में उसी रिकॉर्ड के साथ पति का संबंध दर्ज था। ऐसी स्थिति भी सिस्टम में flag हो सकती है।

8. पिता के नाम में अंतर

एक ही मतदाता के पुराने और वर्तमान रिकॉर्ड में पिता का नाम अलग पाए जाने पर भी सत्यापन की जरूरत पड़ सकती है।

9. मौजूदा और पिछली SIR के बीच उम्र का मेल न खाना

यदि पुराने रिकॉर्ड और वर्तमान रिकॉर्ड के बीच दर्ज उम्र में अपेक्षित अंतर नहीं मिलता है, तो सिस्टम उस रिकॉर्ड को discrepancy के तौर पर चिन्हित कर सकता है।

10. कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं होना

SIR प्रक्रिया के दौरान यदि जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए हैं, तो कुछ मामलों में रिकॉर्ड verification के लिए flag हो सकता है।

11. केवल आधार कार्ड जमा होना

कुछ मामलों में केवल Aadhaar को दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत किया जाना भी अलग से चिन्हित किया गया है। ऐसे मामलों में मतदाता को अपने नोटिस के अनुसार अन्य जरूरी दस्तावेज प्रस्तुत करने पड़ सकते हैं।

‘No Mapping’ क्या है?

No Mapping को Logical Discrepancy की 11 श्रेणियों में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। यह दिल्ली SIR में अलग प्रकार की स्थिति है।

इसका मतलब है कि मौजूदा मतदाता का रिकॉर्ड पिछली SIR की मतदाता सूची से सफलतापूर्वक लिंक या मैप नहीं हो पाया। दिल्ली में करीब 13.79 लाख मतदाताओं को इस श्रेणी में रखा गया है।

पुराने रिकॉर्ड में नाम की स्पेलिंग, उम्र, रिश्तेदार का नाम या अन्य विवरण अलग होने की वजह से भी पुराने और नए रिकॉर्ड को आपस में जोड़ने में परेशानी हो सकती है।

नोटिस मिलने का मतलब नाम कटना नहीं है

SIR के दौरान नोटिस मिलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि मतदाता का नाम अंतिम मतदाता सूची से हटा दिया गया है। दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के मुताबिक नोटिस सत्यापन प्रक्रिया का हिस्सा है और मतदाता को अपना पक्ष रखने तथा जरूरी दस्तावेज देने का अवसर मिलता है।

इसलिए नोटिस मिलने पर घबराने के बजाय उसमें लिखी वास्तविक discrepancy को पहले समझना जरूरी है।

SIR का नोटिस मिले तो क्या करें?

सबसे पहले नोटिस को ध्यान से पढ़ें और देखें कि आपको किस वजह से बुलाया गया है। यदि उसमें नाम, उम्र, माता-पिता के नाम या किसी अन्य जानकारी में अंतर बताया गया है, तो उसी से संबंधित पुराने और वर्तमान दस्तावेज तैयार रखें।

जरूरत पड़ने पर पुराने चुनावी रिकॉर्ड, जन्म प्रमाणपत्र, शैक्षणिक प्रमाणपत्र, पासपोर्ट या चुनाव आयोग द्वारा स्वीकार किए गए अन्य दस्तावेजों का सहारा लिया जा सकता है। हालांकि, कौन सा दस्तावेज आपके मामले में जरूरी है, यह नोटिस में दी गई discrepancy के आधार पर अलग हो सकता है। इसलिए सामान्य सूची के बजाय अपने व्यक्तिगत नोटिस में दिए निर्देशों को प्राथमिकता देना चाहिए।

BLO से मदद लेना भी जरूरी

यदि पुराने SIR रिकॉर्ड को ढूंढने, नाम की स्पेलिंग समझने या किसी रिश्ते से जुड़े रिकॉर्ड को लेकर परेशानी है, तो अपने Booth Level Officer (BLO) से संपर्क किया जा सकता है।

22 सितंबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात पर जोर दिया कि BLO की भूमिका केवल नोटिस पहुंचाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। अदालत ने सुझाव दिया कि अधिकारियों को मतदाताओं को पुराने चुनावी रिकॉर्ड और जरूरी दस्तावेज तलाशने में सहायता करनी चाहिए।

ऑनलाइन या दूसरे माध्यम से जवाब देने की बात भी उठी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि जहां संभव हो, मतदाताओं को दस्तावेज और जवाब ऑनलाइन, ईमेल या WhatsApp जैसे माध्यमों से जमा करने की सुविधा दी जानी चाहिए, ताकि हर व्यक्ति को केवल शारीरिक रूप से उपस्थित होने पर निर्भर न रहना पड़े।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों उठाया सवाल?

22 सितंबर की सुनवाई में अदालत ने ‘Logical Discrepancy’ की प्रकृति और नोटिस जारी करने की प्रक्रिया पर स्पष्टीकरण मांगा। अदालत की चिंता यह थी कि यदि किसी मतदाता को सिर्फ यह बताया जाए कि उसके रिकॉर्ड में कोई logical discrepancy है, लेकिन यह स्पष्ट न किया जाए कि कौन-सी जानकारी में समस्या है और उसे ठीक करने के लिए क्या करना है, तो मतदाता के लिए जवाब देना मुश्किल हो सकता है।

अदालत ने चुनाव आयोग से इस संबंध में जवाब और प्रक्रिया स्पष्ट करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई भी तय की गई है।

सबसे जरूरी बात

दिल्ली SIR में Logical Discrepancy का मतलब सीधे तौर पर वोटर का नाम गलत या अपात्र होना नहीं है। यह मुख्य रूप से चुनावी डेटाबेस में सामने आई ऐसी असंगतियों का संकेत है, जिन्हें सत्यापन की जरूरत है।

अगर आपको नोटिस मिला है, तो सबसे पहले यह पता करें कि आपको किस specific discrepancy के कारण नोटिस भेजा गया है। उसके बाद उसी से संबंधित पुराने रिकॉर्ड और जरूरी दस्तावेज तैयार करके निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपना जवाब दें।

No Mapping और Logical Discrepancy को एक ही चीज नहीं समझना चाहिए। No Mapping का संबंध पुराने SIR रिकॉर्ड से लिंक न हो पाने से है, जबकि Logical Discrepancy के तहत 11 अलग-अलग तरह की डेटा असंगतियों को जांच के लिए चिन्हित किया गया है।

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