सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने छात्रों के विचार व्यक्त करने और सवाल उठाने के अधिकार को लेकर अहम टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि शिक्षण संस्थानों में छात्रों को बिना डर अपनी बात रखने और कठिन सवाल पूछने की आजादी मिलनी चाहिए। किसी छात्र को केवल अलग राय रखने या सवाल पूछने के कारण सजा की धमकी देना संविधान की भावना के खिलाफ है।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि सवाल करना किसी तरह की अवज्ञा या विरोध का प्रतीक नहीं है। उन्होंने छात्रों की आवाज दबाने के लिए पद या अधिकार का इस्तेमाल किए जाने को गलत बताया।
‘यूनिवर्सिटी में सवाल पूछने से डर नहीं होना चाहिए’
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री हासिल करने की जगह नहीं हैं। ये ऐसे संस्थान होने चाहिए जहां छात्रों में स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता विकसित हो और वे किसी भी विषय पर सवाल करने में संकोच न करें।
उनके मुताबिक, छात्रों को स्थापित विचारों और मान्यताओं की समीक्षा करने का अवसर मिलना चाहिए। अगर किसी छात्र की किसी विचार से असहमति है तो उसकी राय को दुश्मनी की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। असहमति का जवाब तर्क और संवाद के जरिए दिया जाना चाहिए।
दीक्षांत समारोह में छात्रों को संबोधित किया
जस्टिस भुइयां ने ये बातें नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में आयोजित स्नातकोत्तर छात्रों के 13वें दीक्षांत समारोह के दौरान कहीं। कार्यक्रम में उन्होंने छात्रों को लोकतांत्रिक मूल्यों, स्वतंत्र विचार और असहमति के महत्व को लेकर संबोधित किया।
उन्होंने कहा कि किसी मुद्दे पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। अगर छात्र अपने विचार साझा करते हैं या किसी स्थापित धारणा पर सवाल उठाते हैं तो उन्हें इसके लिए दंडित करने की धमकी देना उचित नहीं है।
जस्टिस भुइयां के मुताबिक, किसी छात्र को डराकर चुप कराना संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है और इसे सत्ता या पद के अनुचित इस्तेमाल के रूप में देखा जा सकता है।
‘असहमति का जवाब दुश्मनी से नहीं, तर्क से हो’
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में छात्रों को ऐसे विचारों का सामना करने का अवसर मिलता है, जो संभव है कि उनकी अपनी सोच से बिल्कुल अलग हों। ऐसे माहौल में विचारों की जांच, बहस और सवाल लोकतांत्रिक शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि असहमति होने पर सामने वाले व्यक्ति को दुश्मन मानने के बजाय उसके तर्क को सुना जाना चाहिए। अगर देश में ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था बनानी है जिसमें स्वतंत्रता और अलग-अलग विचारों का सम्मान हो, तो इसकी शुरुआत शैक्षणिक संस्थानों से होनी चाहिए।
‘संविधान अलग सोच रखने की आजादी देता है’
जस्टिस भुइयां ने संविधान में मिले विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए असहमति को स्वीकार करना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि समस्या तब पैदा होती है जब किसी अलग राय या विरोध को सामान्य मतभेद मानने के बजाय दबाने या दंडित करने योग्य समझा जाने लगे। उनके अनुसार, अलग विचारों के साथ शांतिपूर्ण तरीके से रहने की क्षमता केवल सामाजिक व्यवहार का हिस्सा नहीं है, बल्कि संवैधानिक लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है।
उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र का मतलब यह नहीं है कि समाज में हर व्यक्ति एक ही विचार रखे। वास्तविक लोकतंत्र तब मजबूत होता है, जब अलग-अलग विचारों को सुना जाए, उन पर चर्चा हो और उनसे असहमति रखने वालों के साथ भी सम्मानजनक व्यवहार किया जाए।







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