Friday, September 04, 2026

राष्ट्रीय

घर खरीदारों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, बिल्डर की गलती की सजा देने से इनकार, नोएडा अथॉरिटी का शुल्क हटाया

घर खरीदारों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, बिल्डर की गलती की सजा देने से इनकार, नोएडा अथॉरिटी का शुल्क हटाया

नई दिल्ली: घर खरीदारों के हित से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी हाउसिंग प्रोजेक्ट को पूरा करने में हुई देरी के लिए पुराने बिल्डर पर लगाया गया आर्थिक दंड उन खरीदारों से नहीं वसूला जा सकता, जिन्होंने पहले ही अपने घर के लिए पैसा लगाया है। अदालत ने यह भी साफ किया कि ऐसी देनदारी का बोझ प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए आगे आई नई कंपनी पर भी नहीं डाला जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद नोएडा अथॉरिटी की ओर से दो हाउसिंग प्रोजेक्ट पर लगाए गए टाइम एक्सटेंशन चार्ज को हटाने का रास्ता साफ हो गया है। अदालत ने इस मामले में खरीदारों को बड़ी राहत दी है।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद नोएडा के सेक्टर-100 और सेक्टर-110 में स्थित लोटस बुलेवार्ड और लोटस पनाचे हाउसिंग प्रोजेक्ट से जुड़ा हुआ है। इन परियोजनाओं का निर्माण ग्रेनाइट गेट प्रॉपर्टीज नाम की कंपनी कर रही थी। कंपनी को वर्ष 2016 तक प्रोजेक्ट का काम पूरा करना था, लेकिन आर्थिक परेशानियों के चलते निर्माण कार्य समय पर पूरा नहीं हो सका।

हालात बिगड़ने के बाद बिल्डर कंपनी दिवालिया समाधान प्रक्रिया यानी CIRP में चली गई। इसके चलते लंबे समय से अपने घर का इंतजार कर रहे खरीदारों की परेशानी और बढ़ गई।

घर खरीदारों ने खुद जुटाया पैसा

प्रोजेक्ट को अधूरा छोड़ने की स्थिति में खरीदारों ने घरों का निर्माण पूरा कराने के लिए खुद पैसे लगाए। इसी दौरान एसएमवी एजेंसीज नाम की कंपनी समाधान योजना के तहत प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए सामने आई।

दूसरी ओर, नोएडा अथॉरिटी ने पुराने बिल्डर की ओर से हुई देरी को आधार बनाते हुए टाइम एक्सटेंशन चार्ज की मांग की। इसी विवाद के बीच लोटस पनाचे के तीन टावरों को सील भी कर दिया गया था।

खरीदारों का तर्क था कि जब वे पहले ही अपने पैसे लगाकर अधूरे प्रोजेक्ट को पूरा कराने की कोशिश कर रहे हैं, तो पुराने बिल्डर की गलती के लिए उनसे अतिरिक्त शुल्क वसूलना उचित नहीं है।

NCLAT के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे खरीदार

इस विवाद में नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल यानी NCLAT ने नोएडा अथॉरिटी के पक्ष में फैसला दिया था। ट्रिब्यूनल ने अथॉरिटी की ओर से लगाए गए शुल्क को दिवालिया समाधान प्रक्रिया से जुड़ा हुआ माना था।

NCLAT के आदेश से असंतुष्ट घर खरीदारों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.बी. पारडीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने की।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने NCLAT के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि समय पर निर्माण पूरा कराने के लिए बिल्डर पर लगाया जाने वाला जुर्माना या शुल्क एक तरह से उसे निर्धारित समय के भीतर काम पूरा करने के लिए बाध्य करने का माध्यम होता है।

लेकिन जब मूल बिल्डर ही दिवालिया हो चुका है और घर खरीदार अपने स्तर पर प्रोजेक्ट को पूरा कराने के लिए आर्थिक योगदान दे रहे हैं, तो पुराने बिल्डर की देरी का वित्तीय भार खरीदारों पर डालना उचित नहीं होगा।

अदालत ने इसी आधार पर नोएडा अथॉरिटी की ओर से लगाए गए संबंधित शुल्क को हटाने का फैसला किया। इस निर्णय से उन घर खरीदारों को राहत मिली है, जो बिल्डर की देरी के कारण लंबे समय से अपने घर का इंतजार कर रहे थे।

खरीदारों के लिए क्यों अहम है फैसला?

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे यह संदेश जाता है कि बिल्डर की गलती और प्रोजेक्ट में हुई देरी का नुकसान सीधे तौर पर घर खरीदारों पर नहीं डाला जा सकता। खासकर उन मामलों में जहां खरीदार खुद प्रोजेक्ट को पूरा कराने के लिए आर्थिक संसाधन जुटा रहे हों।

नोएडा के इन दोनों प्रोजेक्ट से जुड़े खरीदारों के लिए यह फैसला बड़ी राहत के तौर पर सामने आया है।

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