Friday, September 25, 2026

राष्ट्रीय

ECI विवाद ने पकड़ा तूल, राहुल गांधी के आरोपों पर सियासी हलचल बढ़ी; CEC को हटाने की चर्चा

ECI विवाद ने पकड़ा तूल, राहुल गांधी के आरोपों पर सियासी हलचल बढ़ी; CEC को हटाने की चर्चा

चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में बदलाव को लेकर देश की राजनीति में एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है। चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े मुद्दों पर सामने आई रिपोर्ट के बाद विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग ने कहा है कि आयोग के सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

24 सितंबर को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुनाव प्रक्रिया, मतदाता सूची और चुनाव आयोग की कार्यशैली से जुड़े कई सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ियां हुई हैं और इसे उन्होंने ‘वोट चोरी’ से जोड़ा। राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी दोहराई।

चुनाव आयोग को लेकर क्या है पूरा विवाद?

विवाद की शुरुआत एक रिपोर्ट के बाद हुई, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में SIR और मतदाता सूची से जुड़े कुछ फैसलों पर कई बार आपत्ति दर्ज कराई थी। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और दोबारा जोड़ने, डेटा तक पहुंच और अपीलों जैसे मुद्दों से जुड़ी थीं।

हालांकि चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों में बताए गए मतभेदों को अलग तरीके से पेश किया है। आयोग का कहना है कि विभिन्न मुद्दों पर चर्चा और अलग-अलग राय होना संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन अंतिम फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए।

राहुल गांधी ने क्या आरोप लगाए?

राहुल गांधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा कि मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों का असर चुनावी प्रक्रिया पर पड़ सकता है।

उन्होंने अपने संबोधन में ‘वोट चोरी’ का मुद्दा उठाया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा देने की मांग की। राहुल गांधी का आरोप है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली ने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और संविधान से जुड़े गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

राहुल गांधी के इन आरोपों पर बीजेपी ने पलटवार किया है। बीजेपी की ओर से कहा गया कि चुनाव आयोग के भीतर अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा को आंतरिक मतभेद या किसी साजिश के तौर पर पेश नहीं किया जाना चाहिए। आयोग भी स्पष्ट कर चुका है कि उसके अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।

चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां किस मुद्दे पर थीं?

रिपोर्ट के मुताबिक, विवाद का एक अहम हिस्सा Form 6 और SIR के दौरान नए मतदाताओं से मांगी जाने वाली जानकारी से जुड़ा है।

Form 6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नए मतदाता का नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि SIR के दौरान माता-पिता या दादा-दादी के पुराने मतदाता रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी मांगने के लिए अतिरिक्त घोषणा की व्यवस्था की गई।

दो चुनाव आयुक्तों की ओर से कथित तौर पर यह सवाल उठाया गया कि Form 6 एक वैधानिक फॉर्म है और उसमें बदलाव के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन होना चाहिए। चुनाव आयोग का पक्ष है कि Form 6 में बदलाव नहीं किया गया, बल्कि अतिरिक्त जानकारी के लिए Annexure D को जोड़ा गया था। आयोग ने कहा कि यह व्यवस्था SIR से जुड़े उसके निर्देशों के अनुरूप है।

चुनाव आयोग के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी

इस विवाद के बीच विपक्षी दलों की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग तेज हुई है। रिपोर्टों के अनुसार, विपक्ष एक बार फिर संसद में उनके खिलाफ हटाने की प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी कर रहा है। सितंबर 2026 की रिपोर्टों में इसे CEC के खिलाफ तीसरी ऐसी कोशिश बताया गया है; मार्च में दिया गया एक नोटिस अप्रैल में खारिज हुआ था, जबकि 24 अप्रैल को राज्यसभा में दिया गया एक अन्य नोटिस लंबित बताया गया था।

यहां एक कानूनी बात समझना जरूरी है। आम राजनीतिक भाषा में इसे अक्सर ‘महाभियोग’ कहा जाता है, लेकिन CEC के मामले में संवैधानिक प्रक्रिया पद से हटाने (removal) की है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत CEC को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन आधारों और प्रक्रिया के तहत सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है।

CEC को हटाने की प्रक्रिया क्या है?

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया आसान नहीं है। प्रस्ताव लाने के लिए:

  • लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं।
  • राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं।
  • प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद निर्धारित प्रक्रिया के तहत जांच समिति बनाई जाती है।
  • आरोपों की जांच के बाद ही संसद में आगे की कार्रवाई होती है।
  • दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना जरूरी होता है।

इसलिए केवल नोटिस दिए जाने से CEC को तुरंत पद से हटाया नहीं जा सकता।

चुनाव आयुक्तों को मिली कानूनी सुरक्षा भी चर्चा में

विवाद के बीच 2023 में बने मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम की धारा 16 भी चर्चा में है।

इस धारा के मुताबिक, किसी मौजूदा या पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त अथवा चुनाव आयुक्त के खिलाफ उनके आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के दौरान किए गए किसी कार्य, बात या फैसले को लेकर अदालत नागरिक या आपराधिक कार्यवाही स्वीकार या जारी नहीं कर सकती।

इस प्रावधान को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी गई है। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया था, हालांकि उस समय अदालत ने कानून के प्रावधान पर रोक नहीं लगाई थी।

गोवा के 97 मतदाताओं का मामला क्या है?

इस पूरे विवाद में गोवा के 97 मतदाताओं का मामला भी प्रमुख मुद्दा बन गया है।

रिपोर्टों के अनुसार, SIR के दौरान इन मतदाताओं के नाम कुछ ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के कारण जांच के दायरे में आए। बाद में स्थानीय चुनाव अधिकारियों ने दस्तावेजों की जांच की और इन 97 लोगों को योग्य पाया।

समस्या इसके बाद सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार, ECINet सॉफ्टवेयर में पहले हटाए गए नाम को वापस बहाल करने के लिए तत्काल ‘rollback’ विकल्प उपलब्ध नहीं था। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय की ओर से इस सुविधा को उपलब्ध कराने के लिए कई बार चुनाव आयोग को लिखा गया। बताया गया कि 11 से 17 फरवरी के बीच आठ ईमेल भेजे गए थे।

97 मतदाताओं के नाम वापस क्यों नहीं जुड़ पाए?

रिपोर्ट के मुताबिक, जब नाम हटाने की प्रक्रिया पूरी हो गई तो स्थानीय अधिकारियों के पास उसी प्रक्रिया को वापस पलटने का विकल्प उपलब्ध नहीं था। इसी वजह से योग्य पाए गए 97 लोगों के नाम अंतिम मतदाता सूची में समय पर शामिल नहीं हो सके।

चुनाव आयोग ने इस मामले में बताया कि ECINet में Form 7 के जरिए नाम हटाने के बाद उसे वापस पलटने के लिए rollback सुविधा नहीं थी। आयोग ने यह भी कहा कि मतदाता सूची तैयार करने का वैधानिक अधिकार संबंधित Electoral Registration Officer (ERO) के पास ही रहता है और ECINet केवल काम को सुविधाजनक बनाने वाला डिजिटल प्लेटफॉर्म है।

अब 97 मतदाताओं को लेकर क्या हुआ?

इस मामले में 25 सितंबर को नया अपडेट सामने आया है। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने कहा कि फरवरी में प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाए 97 मामलों में से कई लोगों का नाम बाद में मतदाता सूची में दर्ज किया जा चुका है। बाकी मामलों को भी अलग प्रक्रिया के जरिए पूरा किया जा रहा है।

इससे यह मामला अब केवल सॉफ्टवेयर की तकनीकी समस्या तक सीमित नहीं रह गया है। सवाल यह है कि अगर स्थानीय स्तर पर किसी मतदाता को जांच के बाद योग्य माना गया था, तो उसका नाम अंतिम सूची में समय पर क्यों नहीं जोड़ा जा सका और केंद्रीय सिस्टम में उसे सुधारने की सुविधा क्यों उपलब्ध नहीं थी।

बीजेपी और चुनाव आयोग का क्या कहना है?

विपक्ष के आरोपों के बीच बीजेपी ने चुनाव आयोग को लेकर लगाए जा रहे आरोपों को खारिज किया है। बीजेपी की ओर से कहा गया है कि चुनाव आयोग के भीतर अलग-अलग विषयों पर चर्चा को गलत तरीके से राजनीतिक विवाद बनाया जा रहा है।

चुनाव आयोग ने भी कहा है कि SIR से जुड़े सभी अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि ECINet मतदाता सूची तैयार करने का स्वतंत्र निर्णयकर्ता नहीं है, बल्कि EROs को उनके कानूनी काम में सहायता देने वाला डिजिटल सिस्टम है।

आगे क्या होगा?

अब पूरे विवाद में तीन मुद्दे सबसे महत्वपूर्ण हैं—चुनाव आयोग के भीतर सामने आई कथित आपत्तियों पर आगे क्या स्पष्टीकरण आता है, गोवा के 97 मतदाताओं के मामले में सभी नाम कब तक मतदाता सूची में शामिल होते हैं और विपक्ष की ओर से CEC को हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव की प्रक्रिया वास्तव में किस स्तर तक पहुंचती है।

फिलहाल यह विवाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची की पारदर्शिता और चुनाव आयोग की संस्थागत कार्यप्रणाली से जुड़े सवालों पर केंद्रित हो गया है। चुनाव आयोग अपने फैसलों को सर्वसम्मत बता रहा है, जबकि विपक्ष रिपोर्टों और मतदाता सूची से जुड़े मामलों के आधार पर जवाबदेही की मांग कर रहा है।

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